
फिजिटल मार्केटिंग: वह सेवा जो कॉर्पोरेट खरीदना चाहता है और सिर्फ आप दे सकते हैं
भूमिका: अब तक आप विज्ञापन बेचते आए हैं, यानी जगह बेचते आए हैं। बैनर की जगह, लेख की जगह, व्हाट्सएप संदेश की जगह। इसमें दिक्कत यह है कि जगह सस्ती होती है और उसका मोलभाव भी सस्ता होता है।
बड़ा ब्रांड जगह नहीं खरीदना चाहता, वह अभियान खरीदना चाहता है। उसे चाहिए कि उसका संदेश सही जिले तक पहुंचे, लोग उससे जुड़ें, जमीन पर आएं, और यह सब गिना जा सके। इसी पूरे काम का नाम फिजिटल मार्केटिंग है, और यही फर्क आपकी दर को तीन हजार और तीन लाख के बीच तय करता है।
अच्छी खबर यह है कि इस अभियान को चलाने के लिए जो चीजें चाहिए, वे पहले से आपके पास हैं। और जो हिस्सा आपके पास नहीं है, यानी ब्रांड से सौदा, दरें और रिपोर्ट, वह MOJO Network संभालता है। इस लेख में हम यही समझेंगे कि यह सेवा आप अपने जिले में कैसे देंगे।
फिजिटल मार्केटिंग क्या है, आसान भाषा में
फिजिटल दो शब्दों से बना है, फिजिकल और डिजिटल। इसका मतलब है डिजिटल और जमीनी, दोनों को एक ही अभियान में जोड़ देना। इसका पूरा चक्र तीन कदम का है। पहले डिजिटल से लोगों को बुलाना, फिर जमीन पर उनसे मिलना, और फिर उस मुलाकात को वापस डिजिटल पर लाकर गिनना और आगे बढ़ाना।
अलग अलग यह क्यों अधूरा है, यह समझ लीजिए। केवल ऑनलाइन विज्ञापन सस्ता है और उसकी पहुंच बड़ी है, लेकिन वह भरोसा नहीं देता, खासकर छोटे शहर और गांव में, जहां आदमी बड़ी रकम या पढ़ाई का फैसला स्क्रीन देखकर नहीं करता। दूसरी तरफ केवल इवेंट भरोसा तो देता है, पर वह मापा नहीं जाता, इसलिए ब्रांड को पता ही नहीं चलता कि पैसा वसूल हुआ या नहीं।
फिजिटल दोनों की कमी भरता है। यह ऑनलाइन की पहुंच को जमीन के भरोसे से जोड़ता है, और पूरे काम को संख्या में बदल देता है। इसी अभियान के तीन स्तंभ हैं, जिन्हें आगे एक एक करके देखेंगे, डिजिटल लीड, डिजिटल एंगेजमेंट और फिजिकल एंगेजमेंट।
यह काम आपके ही पास क्यों आएगा
बड़े ब्रांड के पास बजट है, डिजिटल एजेंसी है, इवेंट एजेंसी भी है। फिर भी वह जिले में अटक जाता है, क्योंकि इन एजेंसियों के पास वहां जमीन पर काम करने वाला कोई नहीं होता। दिल्ली या मुंबई में बैठी एजेंसी सतना के किसी कस्बे में शिविर नहीं लगा सकती।
यहीं आपकी जगह बनती है, क्योंकि जो चार चीजें इस काम के लिए सबसे जरूरी हैं, वे पहले से आपके पास हैं।
पहली, पिन कोड के हिसाब से बंटा हुआ पाठक। आपका पाठक पहले से उन्हीं इलाकों में बैठा है जहां ब्रांड को पहुंचना है। दूसरी, नाम वाले रिपोर्टर, जो उन मोहल्लों और गांवों में रहते हैं और जिन पर लोग भरोसा करते हैं। तीसरी, व्हाट्सएप की सीधी पहुंच, जिससे संदेश उस व्यक्ति तक जाता है जिसने कुछ मांगा भी नहीं। और चौथी, सबसे कीमती, स्थानीय भरोसा और जमीनी समन्वय की ताकत, यानी कहां अनुमति लेनी है, कौन सा हॉल खाली है, किस दिन बाजार भरता है, यह सब आपको पता है।
ये चारों चीजें पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं, ये सालों में बनती हैं। यही आपकी असली पूंजी है, और यही ब्रांड आपसे खरीदना चाहता है।
स्तंभ एक: डिजिटल लीड
यह अभियान की पहली मंजिल है, जिसका काम है लोगों को जुटाना।
इसमें आप ब्रांड का संदेश उपयोगी सामग्री की शक्ल में अपने पोर्टल पर प्रकाशित करते हैं, प्रायोजित लेख की तरह, जिसके अंत में एक फॉर्म या क्लिक टू चैट लिंक होता है। जो व्यक्ति अपनी जानकारी छोड़ता है, वही आपकी लीड है।
फिर इसका वितरण होता है, पोर्टल पर, व्हाट्सएप चैनल पर, रिपोर्टरों के इलाकावार ट्रैकिंग लिंक के जरिये और सोशल मीडिया पर। यहां पिन कोड टारगेटिंग सबसे ज्यादा काम आती है, क्योंकि आप विज्ञापन केवल उन इलाकों में चलाते हैं जहां से ग्राहक वास्तव में आएगा।
इसका मापदंड साफ है, कितने क्लिक आए, कितने लोगों ने फॉर्म भरा, उनमें से कितने सही निकले, और हर लीड पर कितना खर्च आया।
एक उदाहरण से समझिए। एक ट्रैक्टर कंपनी अपने डेमो दिवस के लिए किसानों का पंजीकरण चाहती है। आप ग्रामीण पिन कोड में लेख और लिंक चलाते हैं, किसान फॉर्म भरता है, और आपके पास डेमो दिवस के लिए इच्छुक किसानों की सूची तैयार हो जाती है। यह अकेली डिजिटल लीड है, लेकिन असली ताकत तब बनती है जब यह अगले दो स्तंभों से जुड़ती है।
स्तंभ दो: डिजिटल एंगेजमेंट
लीड मिल जाना काफी नहीं है, क्योंकि नाम और नंबर अभी सिर्फ एक ठंडी सूची है। डिजिटल एंगेजमेंट का काम इसी सूची को गर्म करना है, यानी नाम से रिश्ते तक ले जाना।
इसके औजार परिचित हैं, प्रश्नोत्तरी, पोल, फोटो प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, प्रश्न श्रृंखला और त्योहारी खेल। इनमें ब्रांड का संदेश खेल के भीतर गुंथा रहता है, जैसे बैंक की वित्तीय साक्षरता क्विज, कोचिंग की प्रश्न श्रृंखला या किसी उत्पाद पर आधारित अनुमान वाला खेल।
यह इसलिए काम करता है क्योंकि भागीदार खुद अपनी प्रविष्टि फैलाता है। जो व्यक्ति प्रतियोगिता में भाग लेता है, वह अपने परिवार और दोस्तों से वोट मांगता है, और इस तरह आपकी पहुंच मुफ्त में बढ़ती जाती है। ब्रांड को इसमें वह चीज मिलती है जो साधारण विज्ञापन कभी नहीं देता, यानी लोगों का समय, उनकी याददाश्त में जगह, सहमति के साथ मिला डेटा, और भागीदारों की बनाई सामग्री।
यहां दो नियम कड़ाई से लागू कीजिए।
पहला, पुरस्कार का खर्च ब्रांड उठाएगा, आपकी जेब से पुरस्कार नहीं जाएगा। आप आयोजक और वितरक हैं, प्रायोजक ब्रांड है। शुरुआत में यही एकमात्र सुरक्षित मॉडल है, वरना आयोजन की लागत आपका मुनाफा खा जाएगी।
दूसरा, नियम, अंतिम तिथि और विजेता चुनने का तरीका प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही साफ प्रकाशित कीजिए। और जहां तक हो सके प्रतियोगिता को कौशल पर आधारित रखिए, यानी अच्छी तस्वीर, सही उत्तर, बेहतर रंगोली, केवल किस्मत या लॉटरी पर नहीं। इनाम वाले संयोग आधारित खेलों पर राज्यवार अलग नियम लागू होते हैं, इसलिए कौशल वाला रास्ता सुरक्षित और साफ रहता है।
स्तंभ तीन: फिजिकल एंगेजमेंट
यह अभियान की सबसे ऊंची मंजिल है, और इसी की सबसे ऊंची कीमत मिलती है, क्योंकि यह वह काम है जो कोई ऐप या एजेंसी दूर बैठकर नहीं कर सकती।
इसमें जमीन पर आयोजन होता है, जैसे जांच शिविर, मेले में स्टॉल, स्कूल और कॉलेज के कार्यक्रम, काउंसलिंग दिवस, टेस्ट राइड, सम्मान समारोह या नुक्कड़ आयोजन। ब्रांड आमने सामने लोगों से मिलता है, और यही मुलाकात सबसे मजबूत लीड और सबसे गहरा भरोसा बनाती है।
इसमें आपकी भूमिका पांच हिस्सों में बंटी है। भीड़ लाना, क्योंकि खाली स्टॉल ब्रांड की सबसे बड़ी शर्मिंदगी है। स्थानीय अनुमति और समन्वय, यानी स्थल, बिजली, पुलिस या नगर पालिका की अनुमति जहां जरूरी हो। मंच संचालन और व्यवस्था। आयोजन का कवरेज, यानी तस्वीरें और वीडियो। और आयोजन में आए लोगों की जानकारी दर्ज करना, ताकि यह आयोजन भी संख्या में बदल जाए।
यहीं आपका रिपोर्टर नेटवर्क सबसे बड़ी संपत्ति बन जाता है। आठ रिपोर्टर आठ इलाकों से लोगों को बुला सकते हैं, यह किसी बाहरी एजेंसी के बस की बात नहीं।
उसी ट्रैक्टर वाले उदाहरण को आगे बढ़ाइए। डिजिटल लीड से इच्छुक किसानों की सूची बनी, अब डेमो दिवस पर वे किसान खेत में आकर ट्रैक्टर चलाकर देखते हैं। यही वह मुलाकात है जिस पर बिक्री टिकती है, और इसी को ब्रांड सबसे ज्यादा कीमती मानता है।
तीनों को जोड़ने वाला चक्र
अलग अलग ये तीनों साधारण हैं। इनकी असली ताकत तब बनती है जब ये एक चक्र में जुड़ते हैं। एक पूरे उदाहरण से देखिए।
मान लीजिए एक ऑटो डीलर अपने नए स्कूटर के लिए पंद्रह दिन का अभियान चाहता है।
पहला चरण, बुलावा। आप पोर्टल पर स्कूटर की खासियत पर प्रायोजित लेख डालते हैं और टेस्ट राइड बुकिंग का लिंक पिन कोड के हिसाब से बांटते हैं। मान लीजिए इस चरण में बाईस सौ क्लिक और तीन सौ चालीस बुकिंग फॉर्म आते हैं।
दूसरा चरण, जुड़ाव। इसी दौरान आप एक फोटो प्रतियोगिता चलाते हैं, अपने शहर के साथ यह स्कूटर, जिसमें प्रविष्टियां आती हैं और हर भागीदार उसे फैलाता है। इससे आपकी पहुंच बढ़ती है और तीन सौ चालीस बुकिंग बढ़कर मान लीजिए चार सौ बीस हो जाती हैं।
तीसरा चरण, मुलाकात। सप्ताहांत पर शोरूम और एक बाजार स्थल पर टेस्ट राइड दिवस होता है, जिसमें रिपोर्टर अपने इलाके से बुक कराने वालों को बुलाते हैं। मान लीजिए दो सौ दस लोग आते हैं और स्कूटर चलाकर देखते हैं।
चौथा चरण, कवरेज। आयोजन की तस्वीरें, वीडियो और विजेता की घोषणा वापस पोर्टल और सोशल पर जाती है। यह कवरेज उन लोगों तक भी पहुंचता है जो नहीं आ सके, और उनमें से कुछ अगली लीड बन जाते हैं।
यही चक्र है। डिजिटल से बुलावा, गेम से जुड़ाव, आयोजन में मुलाकात, कवरेज से वापसी, और उससे अगली लीड। ब्रांड को अंत में एक साफ तस्वीर मिलती है, इतने लोग जुड़े, इतने आए, इतनी बुकिंग हुई, और यही उसे दोबारा आपके पास लाता है।
आपका काम क्या, MOJO का काम क्या
अब सबसे जरूरी बात, क्योंकि यहीं ज्यादातर पोर्टल ओनर घबराते हैं। सोचते हैं कि इतने बड़े ब्रांड से बात कौन करेगा, दर कौन तय करेगा, रिपोर्ट कौन बनाएगा। यह पूरा हिस्सा MOJO Network संभालता है, आपके सिर पर नहीं है।
काम का बंटवारा साफ है।
MOJO के जिम्मे वह सब है जो जिले के बाहर होता है। ब्रांड और कॉर्पोरेट से संपर्क और अनुबंध, अभियान का ढांचा, पैकेज और दरें तय करना, स्लैब के हिसाब से अभियान पोर्टल तक पहुंचाना, अभियान का मापन, ब्रांड को जाने वाली अंतिम रिपोर्ट, और भुगतान का हिसाब।
आपके जिम्मे वह सब है जो जमीन पर होता है, यानी असली एक्जीक्यूशन। संदेश का वितरण, प्रविष्टियां और लीड जुटाना, आयोजन कराना, स्थानीय अनुमति और समन्वय, कवरेज तथा तस्वीरें, और तय समय पर आंकड़े नेटवर्क को भेजना।
इसका फायदा समझिए। आपको अलग से सेल्स टीम नहीं रखनी पड़ती, फिर भी कॉर्पोरेट बजट तक पहुंच बन जाती है। दर पर मोलभाव और अनुबंध का झंझट आपका नहीं रहता। रिपोर्ट का प्रारूप बनाने का काम नहीं करना पड़ता। और जब आपका अपना स्थानीय बाजार सुस्त हो, तब नेटवर्क के अभियान से भरपाई होती रहती है।
एक बात और साफ रहे। यह आपके अपने स्थानीय सौदों की जगह नहीं लेता, बल्कि उनके साथ चलता है। अपने शहर के शोरूम, कोचिंग या अस्पताल से आप जो सीधा सौदा करते हैं, उसकी पूरी राशि आपकी रहती है, उस पर कोई कमीशन नहीं। नेटवर्क से आया अभियान स्लैब दर पर आता है। दोनों रास्ते साथ खुले रहते हैं।
आखिर में यह याद रखिए कि इस पूरे मॉडल में आपकी असली रेटिंग आपका एक्जीक्यूशन है। समय पर भेजे गए सही आंकड़े, आयोजन में असली उपस्थिति, और सच्ची प्रविष्टियां। अगला अभियान और बड़ा बजट इसी भरोसे पर मिलता है, इसलिए यहां गुणवत्ता से समझौता सबसे महंगा पड़ता है।
MOJO पर तकनीकी ढांचा
यह पूरा काम इसलिए संभव होता है क्योंकि इसका ढांचा प्लेटफॉर्म पर पहले से बना है।
अभियान के लिए तेज खुलने वाला मोबाइल फर्स्ट पोर्टल, प्रायोजित लेख और लैंडिंग पेज का ढांचा तैयार मिलता है, इसलिए हर अभियान के लिए अलग से डेवलपर नहीं ढूंढना पड़ता। सब रिपोर्टर के अलग लॉगिन और अपलोडर ऐप से आपकी जमीनी टीम फील्ड से सीधे सामग्री और आंकड़े भेज सकती है। नेटवर्क के अभियान MOJO Ad Manager के जरिये पोर्टल तक पहुंचते हैं। और ऑनबोर्डिंग में मिलने वाला अकाउंट मैनेजर पूरे अभियान में आपके साथ रहता है।
किसी भी अभियान को जमीन पर उतारने, आयोजन की योजना बनाने या आंकड़े भेजने के तरीके में दिक्कत आए तो MOJO Network के प्रतिनिधि से बात कीजिए।
अनुशासन और कानून
कुछ नियम इस पूरे काम की रीढ़ हैं, और इन्हें तोड़ना सबसे महंगा पड़ता है।
प्रायोजित सामग्री पर प्रायोजित लिखना अनिवार्य है, वरना जिस दिन पाठक को लगा कि खबर बिकाऊ है, आपकी पहुंच की कीमत शून्य हो जाएगी, और वही पहुंच आपकी असली पूंजी है।
जो जानकारी लोगों से फॉर्म में ली गई है, वह उसी काम के लिए है जिसके लिए ली गई थी। फॉर्म पर साफ लिखिए कि यह जानकारी किस ब्रांड के साथ साझा होगी। डेटा संरक्षण कानून अब लागू है, और सहमति के बिना डेटा साझा करना लापरवाही नहीं, चूक है।
प्रतियोगिता के नियम पहले प्रकाशित कीजिए और कौशल आधारित रास्ता चुनिए। आयोजन में स्थल, बिजली और भीड़ से जुड़ी स्थानीय अनुमति तथा सुरक्षा का ध्यान पहले रखिए, बाद में नहीं।
और बीमा तथा वित्त जैसे नियंत्रित क्षेत्रों में अपनी भूमिका प्रकाशक और वितरक तक सीमित रखिए, बिचौलिये या सलाहकार की तरह मत बनिए, क्योंकि वहां पंजीयन के बिना काम करना कानूनी रूप से गलत है।
अंत में
फिजिटल मार्केटिंग समझ लेने के बाद आप पर एक बात साफ हो जाती है। आप जिले के प्रकाशक भर नहीं हैं, आप जिले के एक्जीक्यूशन पार्टनर हैं।
अखबार जगह बेचता है, आप अभियान चलाते हैं। डिजिटल एजेंसी दूर से क्लिक गिनती है, आप जमीन पर भीड़ लाते हैं। यही वह चीज है जो न बड़ी एजेंसी के पास है, न बड़े प्लेटफॉर्म के पास। सौदा और हिसाब नेटवर्क संभालता है, जमीन आप संभालते हैं, और इसी बंटवारे में आपकी दर विज्ञापन से निकलकर अभियान तक पहुंच जाती है, जहां कीमत कई गुना होती है।


