
अपना लोकल न्यूज पोर्टल कैसे बनाएं और उसे सफल कैसे करें
अपना लोकल न्यूज पोर्टल कैसे बनाएं और उसे सफल कैसे करें
आज हर जिले, हर तहसील और हर वार्ड की अपनी खबर है, लेकिन बड़े चैनलों के पास उसके लिए जगह नहीं है। यही खाली जगह लोकल न्यूज पोर्टल का असली बाजार है। सवाल यह नहीं है कि पोर्टल कैसे बनेगा, वह तो एक हफ्ते का काम है। असली सवाल यह है कि छह महीने बाद भी लोग उसे रोज क्यों खोलेंगे।
यह लेख दो हिस्सों में है। पहला हिस्सा पोर्टल खड़ा करने का ढांचा है, और दूसरा हिस्सा वह चौदह काम हैं जो पोर्टल को पढ़ा जाने वाला और कमाई करने वाला बनाते हैं।
भाग एक: पोर्टल की नींव
- बीट तय करें, क्षेत्र तय करें अथवा विषय तय करें। पूरे प्रदेश या सभी विषय की खबर मत उठाइए। एक जिला, या एक बड़े शहर के चार से पांच वार्ड, अथवा अपना विषय जैसे राजनीत | रोज़गार | आध्यात्म | खेल | बॉलीवुड या अन्य चुनिए। जितना छोटा दायरा, उतनी गहरी पकड़ और उतना मजबूत विज्ञापन बाजार।
- नाम और डोमेन। नाम में जगह का नाम रखिए, जैसे pannanews.com या bhopalkhabar.in। लोग गूगल पर जगह का नाम ही लिखते हैं, और यही सर्च में आपकी पहली बढ़त है।
- तकनीकी सेटअप। एक साफ, तेज खुलने वाला मोबाइल फर्स्ट पोर्टल, कैटेगरी का सही ढांचा, गूगल न्यूज और गूगल सर्च कंसोल में सबमिशन, और वेब स्टोरीज की सुविधा। पाठक का नब्बे प्रतिशत ट्रैफिक मोबाइल से आएगा, इसलिए डेस्कटॉप डिजाइन पर समय बर्बाद न करें।
- कानूनी तैयारी। पोर्टल पर संपादक का नाम, पता, संपर्क, गोपनीयता नीति, शिकायत निवारण अधिकारी और शिकायत नीति जरूर लगाएं। आईटी नियम 2021 के तहत डिजिटल प्रकाशक के लिए यह अनिवार्य है। साथ में फर्म या कंपनी का पंजीयन, जीएसटी और एक चालू बैंक खाता रखें, क्योंकि सरकारी और कॉर्पोरेट विज्ञापन बिना इसके नहीं आते।
- डिस्ट्रीब्यूशन। पोर्टल अकेले नहीं चलता। पहले दिन से व्हाट्सएप चैनल, फेसबुक पेज, इंस्टाग्राम और यूट्यूब बनाइए। पाठक खबर सोशल पर देखता है और पढ़ने पोर्टल पर आता है।
अब आते हैं उन सत्रह कामों पर जो पोर्टल को सफल बनाते हैं।
- एवरग्रीन स्टोरीज की सूची बनाइए: ब्रेकिंग न्यूज दो दिन चलती है, एवरग्रीन कंटेंट दो साल चलता है। अपने क्षेत्र की स्थायी जानकारी की एक सूची बनाइए और उसे नियमित रूप से प्रकाशित करते रहिए। जैसे: जिले के सभी सरकारी दफ्तरों के पते और समय, अस्पतालों की सूची, ब्लड बैंक और एंबुलेंस नंबर, बस और ट्रेन का समय, स्कूल और कॉलेजों की सूची, दर्शनीय स्थल, स्थानीय व्यंजन, मंडी भाव कहां देखें, जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र कैसे बनवाएं। ये लेख गूगल पर सालभर खोजे जाते हैं और आपके पोर्टल को स्थायी ट्रैफिक देते हैं। हर लेख की साल में एक बार समीक्षा करके तारीख और जानकारी अपडेट कर दीजिए।
- टॉप ऑफ द टाउन रेटिंग स्टोरीज शहर की सबसे अच्छी चीजों की सूची बनाइए और उसे लेख, वीडियो और रील तीनों रूप में प्रकाशित कीजिए। जैसे: शहर की पांच सबसे अच्छी चाय की दुकानें, तीन सबसे साफ रेस्टोरेंट, सबसे अच्छा कोचिंग संस्थान, सबसे लोकप्रिय मिठाई की दुकान, सुबह की सैर के लिए सबसे अच्छी जगह। यह कंटेंट सबसे ज्यादा शेयर होता है, क्योंकि जिस दुकान का नाम आता है वह खुद अपने ग्राहकों में उसे फैलाता है। शर्त एक ही है, चयन का आधार पारदर्शी रखिए और लिख दीजिए कि रेटिंग किस पैमाने पर दी गई है, वरना यह विज्ञापन जैसा दिखने लगेगा।
- मुद्दों पर वोटिंग कराइए हर हफ्ते एक स्थानीय मुद्दे पर पोल चलाइए। जैसे: क्या शहर के मुख्य बाजार में वाहन प्रवेश बंद होना चाहिए, क्या नगर पालिका की सफाई व्यवस्था से आप संतुष्ट हैं, कौन सा फ्लाईओवर पहले बनना चाहिए। पोल पोर्टल पर भी लगाइए और व्हाट्सएप चैनल तथा इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी। सोमवार को पोल, शुक्रवार को परिणाम की खबर। इससे दो फायदे हैं, पाठक हिस्सेदार बन जाता है और आपको हर हफ्ते एक मौलिक खबर मुफ्त में मिल जाती है जो कोई और नहीं छाप सकता।
- अपने शहर के इतिहास पर कहानियां हर शहर के पास किस्से हैं जो किसी ने लिखे नहीं। पुरानी हवेलियां, रियासत का इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में शहर की भूमिका, पुरानी दुकानें जो सौ साल से चल रही हैं, वह पुल जिसका नाम बदल गया, वह मैदान जहां कभी मेला लगता था। बुजुर्गों के इंटरव्यू कीजिए, पुरानी तस्वीरें जुटाइए, जिला गजेटियर और अभिलेखागार से तथ्य मिलाइए। यह श्रृंखला आपके पोर्टल को खबर की दुकान से शहर की स्मृति बना देती है, और यही चीज ब्रांड बनाती है। सप्ताह में एक कड़ी पर्याप्त है।
- सीज़नल सीरीज़ शुरू करिए – प्रत्येक प्रमुख सीज़न, अवसर एवं विशेष समयावधि के लिए एक नई और आकर्षक सीरीज़ अवश्य शुरू कीजिए। जैसे—परीक्षा के मौसम में ‘मेधावी छात्र’, विवाह सीज़न में ‘उत्कृष्ट परिधान एवं अप्रतिम आभूषण’, त्योहारों के अवसर पर ‘पर्व विशेष’, तथा गर्मी की छुट्टियों में ‘समर स्पेशल’ जैसी विषय-आधारित सीरीज़ लाई जा सकती हैं। इससे कंटेंट में विविधता आएगी, दर्शकों की रुचि बनी रहेगी और प्रत्येक सीज़न के अनुरूप विज्ञापनदाताओं को भी बेहतर अवसर मिलेंगे।
- साप्ताहिक विशेष साक्षात्कार – ‘इनसे मिलिए’ कार्यक्रम – प्रत्येक शनिवार किसी प्रतिष्ठित एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का विशेष साक्षात्कार प्रकाशित कीजिए। इसमें शासन | प्रशासन | राजनेता | उद्योगपति एवं व्यवसायी | शिक्षाविद् | चिकित्सक | सामाजिक कार्यकर्ता | युवा प्रतिभाएँ आदि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तित्वों को शामिल किया जा सकता है। इससे पाठकों को प्रेरणादायी व्यक्तित्वों के विचार, अनुभव और कार्यों से परिचित होने का अवसर मिलेगा तथा कार्यक्रम की एक नियमित और विशिष्ट पहचान बनेगी।
- ऑडियंस के साथ सीधा संवाद – ‘आप और हम’ कार्यक्रम – अपने दर्शकों के साथ सीधा और निरंतर संवाद स्थापित करने के लिए ‘आप और हम’ जैसे संवादात्मक कार्यक्रम नियमित अंतराल पर आयोजित कीजिए। इसे वेबिनार, वीडियो कॉन्फ्रेंस (VC) या लाइव इंटरैक्टिव सेशन के माध्यम से आयोजित किया जा सकता है, जिसमें दर्शकों को सीधे प्रश्न पूछने, अपनी राय रखने और विशेषज्ञों अथवा विशिष्ट अतिथियों से संवाद करने का अवसर मिले। इससे दर्शकों की सहभागिता बढ़ेगी और प्लेटफॉर्म के साथ उनका जुड़ाव और विश्वास मजबूत होगा।
- सरकारी योजनाओं की समीक्षा केवल योजना की घोषणा छापना पत्रकारिता नहीं है। असली काम यह देखना है कि योजना जिले में जमीन पर कैसे उतरी। एक योजना उठाइए, जैसे आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान कार्ड, नल जल योजना, छात्रवृत्ति। फिर तीन काम कीजिए: सरकारी आंकड़ा निकालिए कि जिले में कितने लाभार्थी दर्ज हैं, दो या तीन गांवों में जाकर देखिए कि वास्तव में क्या मिला, और संबंधित अधिकारी का पक्ष लीजिए। आंकड़ा, जमीनी सत्यापन और अधिकारी का पक्ष, ये तीनों एक साथ हों तो खबर मजबूत भी होती है और सुरक्षित भी। महीने में एक योजना, साल में बारह मजबूत रिपोर्ट।
- जनप्रतिनिधियों के मद खर्च की समीक्षा विधायक निधि और सांसद निधि का ब्योरा सार्वजनिक होता है। यह जानकारी जिला योजना कार्यालय, सांसद निधि पोर्टल और संबंधित विभागों से मिल जाती है, और न मिले तो सूचना का अधिकार लगाइए। रिपोर्ट में यह दिखाइए कि कितनी राशि आवंटित हुई, कितनी खर्च हुई, किन कामों पर खर्च हुई, कौन से काम कागज पर पूरे हैं और मौके पर अधूरे हैं। यहां अनुशासन जरूरी है। केवल दस्तावेज के आधार पर लिखिए, दस्तावेज की प्रति संभालकर रखिए, जनप्रतिनिधि का पक्ष हर हाल में शामिल कीजिए और अपनी राय की जगह तथ्य रखिए। मानहानि का खतरा वहीं बनता है जहां आरोप हो और सबूत न हो।
- जनप्रतिनिधियों की रेटिंग, सर्वे के बाद रेटिंग तभी छापिए जब उसके पीछे एक सर्वे हो। मनमानी रेटिंग आपकी विश्वसनीयता खत्म कर देगी। तरीका यह है: विधानसभा या वार्ड स्तर पर एक तय संख्या में लोगों से चार या पांच सवाल पूछिए, जैसे उपलब्धता, क्षेत्र में काम, शिकायत सुनवाई, विकास कार्य। नमूने का आकार, तारीख, क्षेत्र और तरीका रिपोर्ट में साफ लिखिए। पहला सर्वे चुनाव से बहुत पहले कीजिए, फिर हर छह महीने में दोहराइए ताकि तुलना दिखे। यह श्रृंखला चुनाव के समय आपके पोर्टल को जिले का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला मंच बना सकती है। ध्यान रखिए, चुनाव आयोग के एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल संबंधी नियमों का पालन अनिवार्य है।
- विभागों की मासिक कार्यप्रणाली रिपोर्ट हर महीने एक तय प्रारूप में विभागवार रिपोर्ट कार्ड निकालिए। पुलिस, स्वास्थ्य, नगर पालिका, शिक्षा और ग्रामीण क्षेत्र, पांच स्तंभ बनाइए। पुलिस: दर्ज प्रकरण, निराकरण, चोरी और दुर्घटना के आंकड़े। स्वास्थ्य: डॉक्टरों के रिक्त पद, दवा की उपलब्धता, प्रसव के आंकड़े। नगर पालिका: सफाई, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइट, शिकायत निवारण। स्कूल: शिक्षक उपस्थिति, मध्याह्न भोजन, भवन की स्थिति। ग्रामीण क्षेत्र: मनरेगा कार्य दिवस, सड़क, बिजली। एक बार प्रारूप बन गया तो हर महीने केवल आंकड़े बदलने होते हैं। यही नियमितता आपको जिले का संदर्भ मंच बनाती है, और अधिकारी भी इसे गंभीरता से लेने लगते हैं।
- सिटीजन जर्नलिस्ट बनाइए आपके शहर में सौ जगह एक साथ कुछ हो रहा है और आप एक जगह हैं। इसका हल है नागरिक पत्रकार। व्हाट्सएप पर एक नंबर सार्वजनिक कीजिए जहां लोग फोटो, वीडियो और सूचना भेज सकें। अच्छी सूचना भेजने वाले को खबर में श्रेय दीजिए, महीने के अंत में सबसे सक्रिय पांच लोगों को प्रमाण पत्र और छोटा सम्मान दीजिए। एक नियम कड़ाई से लागू कीजिए: कोई भी सूचना बिना सत्यापन के प्रकाशित नहीं होगी। नागरिक पत्रकार आपका सूचना तंत्र है, संपादकीय जिम्मेदारी आपकी ही रहेगी। कानूनी जवाबदेही प्रकाशक की होती है, भेजने वाले की नहीं।
- कार्यक्रम कराइए, केवल खबर मत छापिए पोर्टल को जमीन पर दिखना चाहिए। स्वास्थ्य शिविर, नेत्र जांच शिविर, कैरियर मार्गदर्शन शिविर, प्रतिभा सम्मान समारोह, शिक्षक सम्मान, स्वच्छता अभियान। खर्च खुद उठाने की जरूरत नहीं है। अस्पताल, कोचिंग संस्थान, बैंक और स्थानीय ब्रांड ऐसे आयोजनों को प्रायोजित करने के लिए तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें सीधा ग्राहक मिलता है। एक आयोजन से चार चीजें मिलती हैं: प्रायोजन से आय, दिनभर का कंटेंट, शहर में साख, और सम्मानित होने वाले परिवारों के रूप में स्थायी पाठक। साल में चार बड़े आयोजन पर्याप्त हैं।
- ऑनलाइन प्रतियोगिताएं प्रतियोगिताएं सबसे सस्ता और सबसे तेज पाठक जोड़ने का तरीका हैं। किचन क्वीन, शहर की सबसे सुंदर तस्वीर, बेस्ट रंगोली, बाल चित्रकला, गणेश उत्सव की सबसे सुंदर झांकी, मानसून फोटो प्रतियोगिता। प्रविष्टि व्हाट्सएप पर लीजिए, प्रविष्टियां पोर्टल पर गैलरी के रूप में लगाइए, विजेता का चयन जूरी और जन वोटिंग दोनों से कीजिए, और पुरस्कार किसी स्थानीय दुकान से प्रायोजित करा लीजिए। एक प्रतियोगिता में सैकड़ों परिवार जुड़ते हैं और हर प्रतिभागी अपनी प्रविष्टि खुद फैलाता है। नियम, अंतिम तिथि और चयन प्रक्रिया पहले ही साफ लिख दीजिए।
- सब रिपोर्टर की भर्ती कीजिए अकेले कवरेज नहीं बढ़ेगा। हर तहसील, ब्लॉक और बड़े वार्ड में एक संवाददाता बनाइए। चयन में जल्दबाजी मत कीजिए। पहचान पत्र देने से पहले पृष्ठभूमि देखिए, क्योंकि आपके पहचान पत्र का दुरुपयोग सीधे आपकी साख पर आएगा। नियुक्ति पत्र में आचार संहिता लिखिए, यह भी लिखिए कि संवाददाता किसी से वसूली नहीं करेगा। मानदेय का ढांचा साफ रखिए। शुरुआत में तय राशि प्लस विज्ञापन लाने पर कमीशन का मॉडल सबसे व्यावहारिक रहता है। हर संवाददाता को महीने में न्यूनतम खबरों का लक्ष्य दीजिए और मासिक समीक्षा कीजिए।
- व्हाट्सएप से एफिलिएट लिंक वाले विज्ञापन लोकल विज्ञापन का सबसे तेज रास्ता व्हाट्सएप है। हर विज्ञापनदाता को एक अलग ट्रैकिंग लिंक दीजिए, चाहे वह उसकी वेबसाइट का लिंक हो, कैटलॉग का हो या सीधे उसके व्हाट्सएप का क्लिक टू चैट लिंक। फिर उसे रिपोर्ट दिखाइए कि इस महीने कितने क्लिक आए और कितनी पूछताछ पहुंची। लोकल दुकानदार को यह भाषा समझ आती है, अखबार वाली भाषा नहीं। जब उसे दिखता है कि दो हजार रुपये के प्रचार से चालीस लोगों ने संपर्क किया, तो वह अगले महीने खुद फोन करता है। अनुशासन एक ही है, विज्ञापन को विज्ञापन लिखिए और खबर को खबर। दोनों मिल गए तो पाठक और विज्ञापनदाता दोनों चले जाएंगे।
- डिस्काउंट कूपन लॉन्च कीजिए अपने पोर्टल का कूपन कार्यक्रम शुरू कीजिए। स्थानीय दुकानों से बात कीजिए कि आपके पाठकों को दस से बीस प्रतिशत की छूट मिलेगी, और उसे रोज या साप्ताहिक ऑफर के रूप में प्रकाशित कीजिए। तीन तरह से कमाई होती है: दुकान से लिस्टिंग शुल्क, हर भुनाए गए कूपन पर कमीशन, और त्योहारों पर कूपन बुक का प्रायोजन। दिवाली, नवरात्रि, शादी का सीजन और स्कूल एडमिशन का समय इसके लिए सबसे अच्छा है। इससे आपका पोर्टल पाठक के लिए उपयोगी बन जाता है। खबर लोग तब पढ़ते हैं जब कुछ हो, कूपन लोग हर हफ्ते देखते हैं।
तीन महीने का व्यावहारिक रोडमैप
- पहला महीना: पोर्टल, कानूनी पेज, सोशल चैनल, एवरग्रीन कंटेंट की तीस स्टोरी की सूची और उसमें से दस प्रकाशित, व्हाट्सएप चैनल पर पहले पांच सौ सदस्य।
- दूसरा महीना: टॉप ऑफ द टाउन श्रृंखला शुरू, साप्ताहिक पोल शुरू, पहली योजना समीक्षा रिपोर्ट, दो सब रिपोर्टर की नियुक्ति, पहले दस विज्ञापनदाताओं से बात।
- तीसरा महीना: पहली प्रतियोगिता, पहला विभागीय मासिक रिपोर्ट कार्ड, कूपन कार्यक्रम का शुभारंभ, नागरिक पत्रकार नेटवर्क सक्रिय।
अंत में
लोकल न्यूज पोर्टल की सफलता ब्रेकिंग न्यूज से नहीं, नियमितता से आती है। जो पोर्टल हर सोमवार को पोल, हर बुधवार को इतिहास की कहानी, हर महीने की पहली तारीख को रिपोर्ट कार्ड और हर शुक्रवार को कूपन देता है, पाठक उसे याद रखता है।
तकनीक और डिजाइन आज सबसे आसान हिस्सा है। कठिन हिस्सा है भरोसा, और भरोसा तथ्य, पारदर्शिता और निरंतरता से बनता है। यही तीन चीजें आपके पोर्टल की असली पूंजी हैं।
